कर्नाटक चुनाव रिजल्ट 2018: भाजपा ने ऐसे खोला 'दक्षिण का द्वार', ये 5 रणनीति बनी वजह 

खास बातेंपीएम मोदी की रैलियों ने किया असरलिंगायत वोटरों को भी साधने में कामयाब रही बीजेपीयुवाओं का भी जीता भरोसानई दिल्ली: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) रुझानों में ‘कर्नाटक का किला’ फतह कर चुकी है. पार्टी की इस जीत के अहम मायने हैं. खासकर तब जब अगले साल लोकसभा चुनाव होने हैं. इस जीत के साथ ही भाजपा के लिए ‘दक्षिण का द्वार’ भी खुल गया है और पार्टी अब कर्नाटक के बाद धीरे-धीरे दक्षिण के अन्य राज्यों में भी अपनी पैठ बढ़ाने की कोशिश करेगी. कर्नाटक के बाद तमिलनाडु अगला लक्ष्य होगा. तमिलनाडु के बारे में भाजपा खुद कहती रही है कि वहां स्थितियां पार्टी के अनुकूल हैं. इसी साल पूर्वोत्तर में करिश्मे के बाद भाजपा ने अब दक्षिण में करिश्मा किया है. यह करिश्मा यूं ही नहीं हुआ है. इसके पीछे तमाम वजहें हैं. चुनाव प्रचार में पार्टी ने पूरी ताकत झोंक दी. पीएम मोदी खुद ‘रण’ में उतरे. पार्टी अध्यक्ष अमित शाह से लेकर तमाम बड़े नेता धूल फांकते नजर आए. आइये आपको बताते हैं कि भाजपा कैसे बनी ‘कर्नाटकपति’. 

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1- पीएम मोदी का ‘कद्दावर’ कद 
कर्नाटक चुनाव में पीएम मोदी भाजपा के चुनाव प्रचार का प्रमुख चेहरा थे और पूरा दारोमदार उन्हीं पर था. पहले पीएम की 15 रैलियां प्रस्तावित थीं. बाद में इसे बढ़ाकर 21 कर दिया गया. पीएम राज्य के प्रत्येक महत्वपूर्ण इलाकों में लोगों से रूबरू हुए. एक तरफ उन्होंने सत्तासीन कांग्रेस पर हमला बोला तो दूसरी तरफ केंद्र की तमाम योजनाएं भी गिनाईं. राज्य के विकास के लिए भविष्य का खाका भी खींचा. इससे मतदाता जुड़े. 

2 – लिंगायत वोटरों को साधने में सफल रहे 
कर्नाटक में लिंगायत इस बार बड़ा मुद्दा थे. सीएम सिद्धारमैया ने बड़ा दांव खेलते हुये लिंगायतों को अलग धर्म का दर्जा दे दिया, लेकिन भाजपा ने बड़ा दांव खेलते हुए इसी समुदाय के नेता बीएस येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया. तो दूसरी तरफ बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह खुद लिंगायत संतों की दर पर गये और मुलाकात की. माना जा रहा है कि इसका भाजपा को लाभ मिला. 

3 – भ्रष्टाचार के मुद्दे को भुनाने में मिली कामयाबी 
भाजपा ने चुनाव प्रचार में कांग्रेस शासन में भ्रष्टाचार के मुद्दे को जोरशोर से उठाया. खुद पीएम मोदी ने इस मुद्दे पर कांग्रेस पर हमला बोला. उन्होंने कहा कि नोटबंदी के बाद यहां तिजोरियों से भर-भरकर पैसे निकले थे. सिद्धारमैया के तमाम मंत्रियों का भ्रष्टाचार तो जगजाहिर है. पार्टी इस मुद्दे पर मतदाताओं को खींचने और उन्हें विश्वास दिलाने में कामयाब रही. 

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4 – युवाओं पर निशाना सटीक बैठा
कर्नाटक चुनाव में भाजपा युवाओं को भी साधने में सफल रही. विशेषज्ञों की मानें तो एक तरफ जहां पार्टी ने राज्य में बेरोजगारी जैसे अहम मुद्दे को उठाया. तो दूसरी तरफ युवाओं के साथ भेदभाव और स्थानीय विभूतियों को दरकिनार करने के मुद्दे पर भी युवाओं को अपने पाले में खींचा. जिसका फायदा मिला. 

5 – बूथ मैनेजमेंट और कार्यकर्ताओं को तरजीह 
भाजपा ने इन चुनावों में स्थानीय कार्यकर्ताओं को तरजीह दी. तो दूसरी तरफ बूथ मैनेजमेंट पर भी पूरा जोर दिया. हर बूथ पर कार्यकर्ता तैनात किये गए और उन्हें वोटरों को लाने की जिम्मेदारी दी गई. पीएम मोदी खुद कर्नाटक में पार्टी के अलग-अलग मोर्च के पदाधिकारियों-कार्यकर्ताओं से रूबरू हुए और उनमें जोश भरा. जिसका जमीनी स्तर पर फायदा मिला. 

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